संदेश

प्रत्यभिज्ञादर्शनविमर्शः

पठामि संस्कृतं नित्यम्

बहुत बड़ा है यह संसार

थाल सजाकर किसे पूजने चले प्रात ही मतवाले?

पर्वत कहता शीश उठाकर, तुम भी ऊँचे बन जाओ।

गुरुस्तोत्र

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला

चटका, चटका, रे चटका

सरससुबोधा विश्वमनोज्ञा

सोने का कौआ ( स्वर्णकाक: )

लक्ष्यमस्ति निश्चितं तथा विचारितं

भवतु भारतम्